आज दादा [ पिता जी ] की पुण्यतिथि है , आज वे शिद्दत से याद आये तो खूब याद आये
आज उन्हें गए 6 साल हो गए , बहुत दिनों तक तो मुझे लगा ही नहीं की वे हमारे बीच नहीं हैं , एक आदत सी बन गई थी उनके , उनके बिना तो घर की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी , जब में नौकरी के सिलसिले में बिलासपुर आया तो , उसके एक दो साल बाद ही दादा ,अम्मा और छोटा भाई को बिलासपुर ही ले आये थे , वे अंत तक बिलासपुर में ही रहे ,लेकिन उनका मन ग्वालियर में ही बसता था। ये सही है की वे हमेशा अपने परिवार से खिन्न ही रहे , लेकिन अपने बच्चो की बढ़ती आर्थिक सम्पन्नता से वे बेहद खुश रहते थे ,
दादा से मेरी राजनैतिक बहस बहुत गंभीरता से होती थी , कभी कभी तो आसपास के लोगो को लगता था कि हम लोग किसी बात पे झगड़ रहे है , मेरे साथ उनके कभी गंभीर मतभेद नहीं रहे , वे धर्मिक रूप से कतई कट्टर नहीं थे , उन्हें कर्मकांड बिलकुल फिजूल लगते थे , वे कहते भी थे की पंडितो ने अपना पेट भरने के लिए ये सारे प्रपंच कर रखे हैं। जब मेरी माँ का निधन हुआ उसके दो तीन महीने बाद ,उन्हें रामेश्वरम , उटकमंडलम [ ऊटी ] हैदराबाद , मदुरै और कन्याकुमारी गोवा गए थे , उनके साथ की यात्रा बड़ी रोचक थी , वे हमेश अपने मिलिटरी जीवन और परिवार के लोगो के किस्से सुनते थे ,
वे जानते थे की में पूरी तरह नास्तिक हूँ और ईश्वर को नहीं मानता हूँ ,लेकिन कभी ईश्वर के होने पे या न होने पे बहस नहीं की ,मुझे लगता था की वे भी ईश्वर को लेके कोई पक्की धारणा नहीं रखते थे , वे पूजा पाठ करते थे ,और नियमत करते थे , उन्होंने एक बार माँ से कहा था में जानता हूँ की लाखन बड़ा धार्मिक है ,भले ही वो भगवान को नही मानता ,,लेकिन जो वो करता है वही तो धर्म कहता हैं ,शायद ये उनका मेरे लिऐ इससे बडा कॉम्प्लीमेंट था ,में जब कम्युनिस्ट पार्टी और उसकी गतिविधि में सक्रिय था तब भी वो अंदर से बहुत खुश थे ,और कहते भी थे की लाखन जो काम गरीबो के लिए करता है ,वो बहुत अच्छा है ,वे बादल और शैली को बहुत पसंद करते थे , जिन्होंने अपना पूरा जीवन पार्टी को दे दिया था , जब में पहली बार गिरफ्तार हुआ तो वे बहुत नाराज हुए ,लेकिन बाद में हुई गिरफ्तारी पे उन्हें नाज़ भी था,
बिलासपुर में आ के वे बहुत खुश थे , पिता के बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है , में जब उनके निधन के तीन साल बाद हरिद्वार गया तो ,मेने उनके याद में गंगा में पुष्प और दीप अर्पित लिया , मझे लगा की दादा जरूर मुस्करा रहे होंगे ,की देखो लाखन आज गंगा में मेरी याद कर रह है जब की उसकी आस्था ऐसे कामो में बिलकुल नहीं थी , में इस अवसर पे सिर्फ ये लिखना चाहता हूँ की ,अपने पूर्वजो पर खुद के विचार लादने की जगह उनकी आस्था के अनुसार ही उन्हें सम्मान देने चाहिए , में गंगा को देखके हमेशा अपने आप को उससे जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ ,सिर्फ इसलिए की उसमे मेरे पता नहीं कितने पूर्वजो की अस्थिया प्रवाहित हैं ,जो मुझे उनसे जोड़ती हैं।
कुछ फोटो है , खास के एक पौधा
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| प्रीति की शादी में |
| आश्वस्त और दृढ निश्चयी दादा |
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| सेना में नौजवान दादा 1946 |
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| रामेश्वरम में दादा और में |
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| कन्याकुमारी में दादा के साथ मैं |
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| कन्याकुमारी में |
| हरिद्वार में गंगा में पुष्प दीप प्रवाहित किये |
| दादा की स्मृति में लगाया गए पेड़ जो अब फूलों से लद गया है |





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