ham to aise hi hain
Thursday, October 6, 2016
Wednesday, October 5, 2016
मेरा नाती यानी शौना और विक्की का बेटा
विक्की और शौना के बेटा आज दिनांक 6.09.2016
को बिलासपुर में हुआ .
समय 10.15 am
*****
My tiny lil son...
I fell in love with you even before I saw you ... I just couldn't wait for the moment we could be together. I could not have asked for a better gift than you my baby. There is no way I can capture my love for you in words. I love you so very much from the deepest part of my heart and I thank you for entering this world as my son as you are so right for me. Because of you, I am a mom. Because of you, I feel complete. I will be here for you always.. Forever... Love you to the moon and back ...
*****
को बिलासपुर में हुआ .
समय 10.15 am
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My tiny lil son...
I fell in love with you even before I saw you ... I just couldn't wait for the moment we could be together. I could not have asked for a better gift than you my baby. There is no way I can capture my love for you in words. I love you so very much from the deepest part of my heart and I thank you for entering this world as my son as you are so right for me. Because of you, I am a mom. Because of you, I feel complete. I will be here for you always.. Forever... Love you to the moon and back ...
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Shrmishtha singh (ghosh )
Shona date 3.10.16
मेरा नाती यानी शौना और विक्की का बेटा
विक्की और शौना के बेटा आज दिनांक 6.09.2016
को बिलासपुर में हुआ .
समय 10.15 am
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My tiny lil son...
I fell in love with you even before I saw you ... I just couldn't wait for the moment we could be together. I could not have asked for a better gift than you my baby. There is no way I can capture my love for you in words. I love you so very much from the deepest part of my heart and I thank you for entering this world as my son as you are so right for me. Because of you, I am a mom. Because of you, I feel complete. I will be here for you always.. Forever... Love you to the moon and back ...
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को बिलासपुर में हुआ .
समय 10.15 am
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My tiny lil son...
I fell in love with you even before I saw you ... I just couldn't wait for the moment we could be together. I could not have asked for a better gift than you my baby. There is no way I can capture my love for you in words. I love you so very much from the deepest part of my heart and I thank you for entering this world as my son as you are so right for me. Because of you, I am a mom. Because of you, I feel complete. I will be here for you always.. Forever... Love you to the moon and back ...
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Shrmishtha singh (ghosh )
Shona date 3.10.16
वसीयत शरीर के बारे में **** दिनांक 6 .10.2015
वसीयत शरीर के बारे में
****
दिनांक 6 .10.2015
ये मेरी वसीयत नहीं है क्यों की मेरे पास ऐसा कुछ है ही नही जो में अपने बच्चो में बाँट सकूँ .( आर्थिक या संपत्ति )
मेरे बाद मेरा शरीर जरुर है जिसका निबटारा करने के लिए मेरे मन में बहुत सालों से इच्छा है . जो निम्न है .
1. मेरे शरीर और सारे अंग को सरकारी अस्पताल में दे दिया जाये , इसकी लिखा पढ़ी में समय रहते कर रहा हूँ , दान शब्द का में जानबूझ के उपयोग नही कर हूँ . शरीर अस्पताल में भेजने में जल्दी करना होती है इसका ख्याल रखें . चाहें तो पहले शरीर को जरूरी अंग निकालने के लिए भेज दे, उसके बाद शरोर वापस घर मंगा ले और बांकी लोगो के इंतजार के बाद अंतिम रूप से अस्पताल को भेज दें .
2. जैसा की सब जान ही गये होंगे की मेरा धर्म और उसकी किसी भी क्रिया में लेश मात्र भी विश्वास नहीं है तो स्वाभविक ही है की मेरे बाद मेरे नाम से किसी भी प्रकार का संस्कार न किया जाये , अर्थात कोई अनुष्ठान न करें , तेरवी से लेके श्राद्ध तक या कुछ और
3. अगर संभव हो और आर्थिक स्थिति अनुमति दे तो साल में एक बार आपस में तिथि और माह तय करके पुरे परिवार के लोग किसी के भी घर में ( यानि विक्की सीटू या जुली ) एकत्रित हो के आपसी मेलजोल बैठक आयोजित कर सकें तो ठीक है न हो तो कोइ बाध्यकारी भी नहीं है .
4 मुझे अलग से कुछ लिखना होगा तो जरुर लिखूंगा ये तो मेरे बाद मेरे शरीर और अनुष्ठान को लेके था .
लाखनसिंह बिलासपुर
6.10.2015
Sunday, September 21, 2014
श्री महावीर सिंह का निधन
श्री महावीर सिंह का निधन
अभी सवेरे खबर मिली की भाभी के बड़े भाई साहब श्री महावीर सिंह तोमर का रात को 2,30 बजे हार्ट अटैक से निधन हो गया , उन्हें अंतिम संस्कार के लिए उनके पैतृक गॉव सिहोनिया ले जाया गया है , वे ग्वालियर में परिवार सहित रहते थे , में एक बार नहीं कई बार उनके घर गया और उनसे मिलता ही रहता था ,वे बेहद हसमुख और मिलनसार व्यक्ति थे ,भाभी के सबसे बड़े भाई होने की पूरी जिम्मेदारी निभाते थे ,
मेरी उन्हें श्रद्धांजलि
लाखन सिंह
अभी सवेरे खबर मिली की भाभी के बड़े भाई साहब श्री महावीर सिंह तोमर का रात को 2,30 बजे हार्ट अटैक से निधन हो गया , उन्हें अंतिम संस्कार के लिए उनके पैतृक गॉव सिहोनिया ले जाया गया है , वे ग्वालियर में परिवार सहित रहते थे , में एक बार नहीं कई बार उनके घर गया और उनसे मिलता ही रहता था ,वे बेहद हसमुख और मिलनसार व्यक्ति थे ,भाभी के सबसे बड़े भाई होने की पूरी जिम्मेदारी निभाते थे ,
मेरी उन्हें श्रद्धांजलि
लाखन सिंह
परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति मेरी नज़र में
परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति मेरी नज़र में
लाखन सिंह [ 21 ,09 ,2014 तक ] बिलासपुर
| हमारे परिवार का सबसे पुराना उपलब्ध फोटो ,इसमें सबसे पहले काकाजी ,बापू [ बाबा \ दादा , बैठे हुये सुरेन्द्र की माँ हमारी दादी गोद में सबसे बड़े भाई साहब ,और आखरी में हमारी माँ |
प्रारंभ
हमारी पारिवारिक शुरुवाद लश्कर के कम्पू बजरिया स्थित मकान से होती हैं ,जो आज भी विनम्रता के साथ खड़ा है ,इस माकन को हमारे दादा [ पिता ] ने बेहद विषम स्थितियों में 1975 का आसपास किसी को बेच दिया था , हमारे पितामह श्री गजाधर सिंह ,दादी इसी घर में आके रही थी , दादा ने बताया था की उनका परिवार मोरेना के सबलगढ़ तहसील के नंदपुरा बुरहना से आया था , बाबा के साथ शायद उनके भाई नारायण सिंह भी आये थे ,ये तो नहीं मालूम की वो किस सन में आये थे ,लेकिन मेरे पता और काकाजी [ उनके छोटे भी ,बहन ] इसी घर में पैदा हुए थे , तो इरना पक्का है की वे 1926 के पहले ही आये होंगे।
बाबा
हमारे बाबा श्री गजाधार सिंह सिंधिया की सेना में रहे थे ऐसा हमें बताया गया हैं , उनके भाई नारायण सिंह भी सेना में ही थे , इस प्रकार कहा जा सकता है की हमारे पूर्वजो का सम्बन्ध सेना से रहा था जो दो तीन पीढ़ी तक कायम रहा , मुझे उनकी बहुत ज्यादा याद नहीं है सिवाय इसके की उनकी मुझें बहुत रोबदार थी , भरी पूरी हाइट लगभग 6 फिट ,गोरे और रोबदार आवाज़ के धनी , उनका निधन शायद 1958 के आसपास हुआ था ,मुझे सिर्फ एक दृश्य याद आता है ,की जब वे अंतिम साँस ले रहे थे ,तो पता नहीं उन्होंने कहा या किसी ने प्रेमवश उन्हें पेड़ा और दही खिलाया था , वे बड़े चाव से खा रहे थे , इससे एक बात तय है की अंतिम समय तक वे होश में और खुश दिखाइ दे रहे थे , मुझे उनके अंतिम यात्रा की धुंदली सी याद है , घर वालो ने हम दोनों भाइयो को पड़ोस के रामेश्वर तिवारी के घर में भेज दिया था , हमने एक खिड़की से उनकी यात्रा देखि थी , मेरी उनसे कभी कोई बातचीत हुई हो याद नहीं पड़ता ,
पुश्तैनी घर
हमारे लश्कर स्थित घर का वर्णन करते समय आप आजकल की किसी झोपड़ पट्टी की कल्पना कर सकते हैं ,
फर्क सिर्फ इतना की माकन की ज़मींन हमारी थी , ये बात में अपने होश सम्हालने के समय की कर रहा हूँ अर्थात 1959 के आसपास की , घर शायद 25 गुना 40 का रहा होगा , उसमे मकान के नाम पे सिर्फ दो पाटौर थी , पाटौर से मतलब कच्ची दिवार के ऊपर पत्थर की प्लेट नुमा छत होती है , हाइट लगभग 8 -9 फिट रही होगी , सामने छोटा सा आँगन , बिजली की बात तो उन दिनों कोई मोहल्ले में भी नहीं सोचता होगा, पाटौर के पीछे एक गली या छेंडी सी बानी थी ,जो बाद में हमारे घर का हिस्सा बन गई , मुझे हालाँकि उन पाटौर में रहने की बिलकुल याद नहीं हैं , लेकिन इतना याद है की कभी कभी इन पतौर की छत से सांप निकला करते थे , जिन्हे हमारी दादी यानि बूढी अम्मा निचे निकाल के सूप में डाल के बहार गटर में दाल देती थी ,मेने कभी सांप को मरते नहीं देखा ,
इसी माकन के पास एक खाली हिस्सा पड़ा था , बाद में दादा ने उसे काकाजी को दे दिया , हमें दादा ने था की वो जमीं दादा की ही थी ,लेकिन उन्होंने उसे काकाजी को देदी ,क्योकि उनके पास अपनी कोई जमीन नहीं थी , मुझे उस पुराने माकन की बस एक दृश्य अभी तक याद है ,जब दादा ने एक तराजू ले के अपने भाई के साथ हिस्सा बाँट किया था ,पता नहीं क्यों वो दृश्य मुझे आज तक बहुत ख़राब लगा , उसके बाद कभी भी ऐसा मौका नहीं आया जब कोई हिस्सा बाँट हुआ हों। ,
उसी मकान में दादा में 1960 के आसपास एक बड़ा कमरा बनवाया जो शायद २० फिट गुना १५ फिट था , आँगन के इस तरफ टीन डाल के रसोई और उसके पास एक पाटौर ,कमरे पे अभी भी टीन शेड था इसी कमरे पे 1968 के आसपास पक्की छत बनी , छत पे जाने के लिए एक जीना बना ,और बगल की पतौर पक्की बन गई ,लेकिन एक स्थाई झगड़ा इसी समय से शुरू हो गया ,हमारे पड़ोस में श्री मूंगा राम सिंह सिकरवार रहते थे ,इनकी जमीन पे ही ये आवाज़े खुलता था , किसी ने उन्हें दरवाजे के सामने की जमींन भी बेच दी थी , ये दयवाजा हमारे घर के लिए बड़ी मुसीबत लेके आया , कई सालो मुकदमा चला ,रोज रोज झगड़ा होने लगा ,हमारे घर की शांति कई सालो भंग हुई , बाद में इसी झगडे से निजात पाने के लिए ये घर दादा को बेचना पड़ा , बहुत अपमानजनक स्थिति थी ,की हमें अपना पुश्तैनी मकान बेचने को मजबूर होना पड़ा , इसका विवरण बाद में विस्तार से करेंगें
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| हमारे पुश्तैनी मकान में बड़े भाई साहब के साथ |
।
उस समय की आर्थिक स्थति ;
मेने जब भी होश सम्हाला तब से दादा को नौकरी करते पाया , वे उस समय पुलिस में वायरलैस में ऑपरेटर की नौकरी करते थे, हमारे काकाजी भी एस ए ऍफ़ में सिपाही हो गए थे , इस तरह दूसरी पीढ़ी भी फ़ोर्स में आ गई थी , दादा इसके पहले इन्फेंट्री [ सिंधिया की सेना ] के सिग्नल कोर में थे ,
हमारे घर की आथिक स्थति आज सोचते है तो बहुत कमजोर थी ,लेकिन उस समय हम मे से किसी को अपनी आर्थिक हालत पे कोई कमी या अफ़सोस नहीं था ,हम किसी ने ये सोचा भी नहीं की गरीबी होती क्या है ,क्योकि हमरा पाला कभी अमीरी से पड़ा ही नहीं था , सिर्फ दादा ही नौकरी करते थे ,और घर में हम पांच भाई बहन ,माँ और दादी थे ,मुझे याद है की दादा की मासिक तनख्वाह मात्र 75 रुपए था , काकाजी की हालत थोड़ी अच्छी थी ,क्योकि उनके यहाँ बहु बाद में इक बेटा और एक बेटी हुई , खर्च काम होने के कारण हालत कुछ बेहतर थे, दादा पुलिस में और काकाजी एस ए ऍफ़ सिपाही थे ,रिटायर्ड होते तक दादा हवलदार हो गए थे , हाँ हमारे घर म ेपुलिस जैसा माहोल कभी नहीं बना ,कारण की दादा जिस पुलिस में थे वो थाने की नहीं बल्कि तकनिकी [ वायरलेस ] का काम था ,
मुझे याद है की उन दिनों 16 रुपये का मन गेहू और 200 रुपये का एक तोला सोना था , भाईसाहब की शादी के समय देश में अनाज के बड़ा संकट था , आस्ट्रलिया का गेहूं लाल वाला मिलता था और मोटा अनाज घरो में आता था ,बाजरा ,ज्वार ,मक्का चना और कंट्रोल का लाल गेहू , दादा की एक बात बहुत महत्वपूर्ण थी, की चाहे कितनी भी काम इनकम हो घर में गेहू और नमक खाने लायक लेलेना चाहिए , और बुरी से बुरी हालत में उधार किसी से नहीं लेने हैं , आज तक हम सब भाइयो में एक बात कॉमन है की किसी पे कोई क़र्ज़ नहीं हुआ , और बाद की पीढ़ी में भी यही अघोषित नियम बन गया , दादा का समय और बाद में हमारे परिवार परिवार पे एक पैसा भी किसी का क़र्ज़ नहीं हो पाया ,
दादी [ बूढ़ी अम्मा ]
हम सब लोग अपनी दादी को बूढी अम्मा कहते थे ,वे छोटे कद की बहुत सीधी साधी महिला था , स्वाभविक रूप से वो सबको बहुत प्यार करती थी ,उनकी बहुत सी याद मेरे ज़हन में हैं , मेरे बाबा की हाइट लम्बी थी और दादी की छोटी ,इससे ही हमारे अगली पीढ़ी दो तरह की हाइट के लोग होते रहे ,जो आज भी जारी हैं, मेने उन्हें कभी बहुत गुस्सा होते नहीं देखा और न ही अपनी बहुओ से लड़ते देखा , वे रोज शाम सवेरे राम राम नाम की लिखी छोटी सी किताब पे हाथ फेरते और राम राम का जाप करते देखता था , वे पढ़ी बिलकुल नहीं थी ,
मेरी पढाई के बाद उन्हें मेरी नौकरी की बहुत चिंता रहने लगी थी ,
मेने बहुत बाद में जाना की कैसे उनकी जबान पे फ़ारसी के शब्द आते थे ,जैसे जब बाजार जाओ तो वो कहती थी की पहले फेरिस्त तो बना लो, फेरिस्त फ़ारसी में सूचि को कहते हैं ,वे मुरैना को पेच कहती थी , उनका मायका मुरैना के जगतपुर गॉव में था , उनके रिश्ते के एक भाई ज्वाला सिंह आत्मसमर्पित बागी [ डाकू ] थे। मेने उनकी कहानी राम कुमार भ्रमर की किताब में बाद में पढ़ी भी थी , मने उन्हें कभी बहुत पूजा पाठ करते।
नहीं देखा , सिवाय शाम को आरती और राम नाम का पाठ के ,
दादा और सेना की नौकरी
अभी पिछले दिनों दादा के कागजात देखे तो मालूम हुआ की 22 , 09 ,
1942 को सेकेण्ड इन्फेंट्री बटालियन में नायक के पद पे भर्ती हुए थे , उन्होंने 8 साल 6 महीने और 9 दिन सेना की नौकरी की ,और वे 1 ,04 ,1951 को रिटायर्ड हुए ,उस समय उनकी उम्र सिर्फ 29
साल की थी ,यानि वो 21 साल की उम्र में सेना में चले गए थे ,उन्हें सेना में वॉर मैडल , इंडियन सर्विस मेडल और इंडिपेंडेंट
मेडल मिला था , वे 1944 में पूना गए और वहा से सिग्नल कोर की ट्रेनिंग की थी उनका सैनिक न , 5727 था ,वे बताते थे की उनको पोस्टिंगः शिलांग में हुई थी , वे अक्सर उसका जिक्र करते थे , उनकी बटालियन मुरार पे ही रहती थी , उन्होंने एक बार ये भी बताया था की उनके कुछ सैनिको ने मुरार के एक ऑफिस में अंग्रेजीइ झंडा उतार के तिरंगा झंडा फेहरा दिया था ,उसके बाद में सब लोग भाग गए थे , सेना के किसे बहुत सुनाते थे , मेरे मन में सेना के प्रति प्रेम और लगाव शायद उनके किस्से या जेनेटिक कारणो से आया होगा , में हमेशा सेना में ही जाना चाहता था ,,ये तो ठीक है की में सेना तो क्या किसी फ़ोर्स में भी नहीं जा पाया लेकिन जब पढाई का मौका मिला तो मेने मिलिट्री साइंस पूरी पढाई की ,और आज भी मेरा मन सेना की तरफ झुकता हैं।
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| दादा सेना में |
सेना के बाद छोटे मोटे काम
सेना से उनका रिटायरमेंट 29 साल की उम्र में ही हो गया था , उसके बाद घर को चलने के लिए उन्हें बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा , दादा और अम्मा ने बताया की उन्होंने सबसे पहले बजरिया में ही एक मिठाई की दुकान खोली ,जिसमे मिठाई के साथ दूध जलेबी भी मिलती थी ,यद्यपि हम लोगो ने ऐसी कोई दुकान तो नहीं देखि , वो दुकान भी शायद ज्यादा नहीं चली ,लेकिन दादा का मिठाई बनाने का अनुभव हम लोगो ने आखरी तक देखा , दिवाली होली में दादा अक्सर जलेबी ,बर्फी या दूसरी मिठाई जरूर बनाते थे , दुकान जल्द ही बंद हो गई , तो दादा ने किसी की सिलाई की दुकान से सिलाई सीखी ,और उसी बजरिया में सिलाई की दुकान खोली , उन्हें कपडे सिलने का बहुत अच्छी हुनर थी , कोट ,पेंट ,शर्ट ,कुरता वगैरा बहुत अच्छा सिल लेते थे , दादा बिलासपुर अं एके बाद भी अक्सर घर के कपडे सिलने का काम करते थे , उनके पास जर्मनी की एक पफ मशीन थी ,जो अपने निधन के दो साल पहले उन्होंने किसी को बेच दी थी ,
एक घटना वो जरूर बताते थे की एक बार किसी वायरलेस के कर्मचारी से लड़ाई होने पे उन्होंने ऊसर कैंची से वॉर कर दिया था , गंभीर चोट लगी थी। बाद में राजीनामा हो गया था , एक निम्न गरीब परिवार में जो स्थितियाँ होती है वाही सब हमारे परिवार में थी ,
वायरलेस की नौकरी
ये सब काम करते समय ही उनकी नौकरी मद्यप्रदेश पुलिस के वायरलेस विभाग में ऑपरेटर के पद पर लग गई , इसके लिए उनका पूना का सिग्नल की ट्रेनिंग काम आई , 58 साल की उम्र तक उन्होंने यहाँ नौकरी की , सारा काम बेहद अंग्रेजी में होने के कारण उनकी अंग्रेजी रायटिंग बहुत सुन्दर थी ,उनकी ड्राफ्टिंग बहुत सटीक थी , हमारे होश सम्हालने के बाद से वे यही नौकरी करते थे , सब बच्चो को पढाई लिखाई इसी समय ही हुई , जैसा की पहले भी बताया है की उस समय पुलिस के सेलरी किसी विभाग में चपरासी से भी काम होती थी ,सुविधा के नाम से कोई सुविधा नहीं मिलती थी ,हां दादा के मिलिटरी से रिटायर्ड होने के कारण हम दोनों भाइयो को पढाई के लिए सेना से वज़ीफ़ा मिलता था , वो नाम मात्र को ही था ,लेकिन हमारी दादी हर साल मोती महल स्थित मिलिटरी वेलफेयर विभाग लेजाती थी , जहा से कुछ राशि हम दोनों को मिलती थी , मुझे उन दिनी किसी उत्सव या बड़े त्योहारो की याद नहीं हैं ,
दादा की मीठी कड़वी यादें
दादा की बहुत सी मीठी कड़वीयादें हम सब भाइयो को अच्छी तरह याद हैं ,मे अपनी लिखता हूँ , ये सही है उनकी यादो में मीठी कम और कड़वी ज्यादा हैं ,वे बहुत सख्त ,नाराज और अनुशाशन प्रिय रहे हैं , आखरी दिनों में तो नहीं लेकिन प्राम्भिक दिनों में उनके घर में आते ही आतंक सा माहोल बन जाता था , मुझे याद है की उनकी ड्यूटी 6 -6 घंटे की बाल्टी रहती थी ,हम लोग आशा करते थे की वो ड्यूटी में ही रहे , उनकी बहुत सी परिस्थितिया यहाँ लिखना उनका असम्मान होगा , उस समय के हालात उनकी जीवन विकास और जातिगत सामंती सोच ने उन्हें ऐसा बनाया होगा
, मेरे पास उनकी बेहद ख़राब छबि भी सजोई है ,लेकिन उन्हें लिखना में बिलकुल नही चाहता , लेकिन मोटी मोटी घटना नहीं बताना भी बेईमानी होगी ,
में हमेशा ये कहता हूँ और ये सच भी है की मेंने हमेशा आपने आप को उनके ठीक विपरीत बनाने की कोशिश की ,और में पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूँ की मेरा व्यक्तित्व पूरी तरह उनके ठीक विपरीत बना , मेरे सामने एक ऐसा आदर्श था ,जिसका में खंडन या विरोध तो नहीं कर सकता था , लेकिन अपने आपको उसके खिलाफ निर्माण तो कर ही सकता था , में इसके लिए उनका हमेशा आभारी रहूँगा की उनके कारण में में अपनेआप को किसी और तरह खड़ा कर पाया ,
वे एक घटना सब को जरूर सुनते थे की सेना के समय उनके एक ऑफिसर पवार साहब थे ,जो शायद कमांडेंट या उसके समकक्ष कुछ थे, उनके घर उनका बहुत आना जाना था ,इस परिवार से उनके घरु रिश्ते भी थे ,व् ेकहते है की एक बार पवार साहब की बेटी जो शायद घुड़सवारी भी करती थी ,और दादा भी करते होंगे ऐसा लगता है , एक बार बेटी आई दादा के पास और कहा की में घर से बहुत से जेवर ले हूँ ,तुम मेरे साथ चले चलो ,मेतुम्हारे साथ शादी करुँगी ,लेकिन दादा ने उसे समझाया और वापस घर भेज दिया , दादा ने पूरी तफ्सील से ये कहानी तो नहीं बताई ,शायद उम्र और रिश्तो की बढ़ा रही होगी ,लकिन आज में सोचता हूँ की यदि दादा इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते तो हमारे परिवार की कहानी क्या होती , दादा ने यह कभी नहीं बताया की क्या वो उस लड़की से प्रेम करते थे या नही , या की वो एक तरफा प्यार था , सही बात तो ये है की उस समय प्यार करना भी एक अश्लील काम मानते थे ,इसलिए उन्हों एकभी अपने मन की बात नहीं बताई ,
राजनीति और सामाजिक समझ
दादा की सोच जातिवादी ,सामंती और संकीर्ण ही थी , केकिन वे धार्मिक रूप से जरूर उदार थे , कर्मकांड को ज्यादा नहीं मानते थे ,वे इसे पंडितो के पेट भरने की कवायद मानते थे ,वे आजादी के आंदोलन के समर्थक तो जरूर थे ,लेकिन गांधी जी ,नेहरू जी आदि केबड़े आलोचक थे ,इस प्रकार के संघ [ RSS] के प्रचार से प्रभवित थे ,वे गाहे बगाहे अंग्रेजो की बड़ी तारीफ करते थे ,लेकिन भगत सिंह चन्द्र शेखर आजाद ,क्रांतिकारियों के मुरीद थे ,ऐसा ही संघ के लोग करते भी हैं , लेकिन मेने कभी उनके मुह से RSS तारीफ नहीं सुनी ,शायद वे कभी शाखा में भी नै गए होंगे , सिंधिया शाशको की भी वे तारीफ करते थे , वे ब्राह्मण विरोधी , और अपनी से छोटी जतियों के भी विरोधी थे ,वे मुस्लिम , ईसाई ,दलित विरोधी भी थे , पहले जनसंघ और बाद में भाजपा के समर्थक भी थे ,आप ये कह सकते है की किसी भी संघ के व्यक्ति से मिले तो वो यही सब समझ के साथ आपके सामने आयेगा , ये भी स्वाभिक है की वे महिला विरोधी भी हों ,उनके पूरा जीवन महिला विरोधी शक में बीता ,
मेने पहले भी लिखा है की वे बहुत पुजा पाठ भी नहीं करते थे , लेकिन एक अनुशाशन उनका बड़ा सख्त था ,की शाम की जब आरती का समय हो तो सब बच्चो को उसमे शामिल होना जरुरी है ,हम लोग आरती के लिए भागे भागे घर आते थे। मेने उस समय की आरती की फिर कभी हमारे किसी भी घर में नहीं देखा , बड़े आदर से पूरा घर भगवन के आले के सामने जोर जोर से आरती जाता था , दादा के आदेश थे की कॉिम कही भी बाहर हो लेकिन आरती के समय जरूर हाजिर हो जाये ,
दादा की बहुत सी स्मृतियाँ मेरे मस्तिष्क में घुमती रहती है ,जैसे की उन्हें बांसुरी बजाना बहुत अच्छी तरह आती थी ,और वे चित्र भी बना लेके थे ,देख के हूबहू वैसे , उनकी हेंड रायटिंग बेहद खूबसूरत थी ,कपडे की सिलाई ,मिठाई बनाना और खूब हँसना मुझे नहीं भूलता ,
वे हमारे साथ 1082 के आसपासहमेशा के लिए बिलासपुर आ गए थे ,मेरी माँ और मेरे छोटा भाई पप्पू [शत्रुघन सिंह ] वे यहाँ आके बहुत खुश थे , उन्हें हमारी सुधरती आर्थिक स्थिति पे बहुत गर्व होता था , एक समय था जब हमारे पास बहुत गाड़िया और बहुत के कार्यकर्ता थे [ लिट्रेसी केम्पेन ] उन्हें लगता था की हमारे दिन बहुत अच्छे आ गए हैं , कभी कभी उनका मन ख़राब भी होता था तो वे भाईसाहब के पास ग्वालियर ,भोपाल चले जाते थे , वह से नाराज होके फिर बिलासपुर आ जाते थे , भरा पूरा संपन्न परिवार देख के उन्हें संतोष भी खूब था ,लेकिन उनके भाव के अनुसार उन्हें कोई भी चलता नहीं दिखा , तो वे दुखी हो जाते थे , उन्हें एक बात का दुःख जरूर था की उन्होंने अपन अलग से मकान क्यों नही बनवाया , सब बच्चो का उन्होंने बहुत ख्याल रखा , अभी कभी अम्मा से वे कहते भी थे की हमने अपना माकन बनाया होता तो हम इस तरह अपने बेटों के पास नहीं रहते , वे कई बार नाराज होके गए ,कभी यहाँ तो कभी वहाँ ,आज में इस दुःख को समझ सकता हूँ की ये दुःख कैसा होता होगा ,वे अपनी बहुओ से हमेशा नाराज रहे , कभी इससे इससे कभी उससे , और यही कारण था की बहुओ ने उन्हें वो सम्मान नहीं दिया ,जिसके वो हकदार थे , हम सब उन्हें समझते तो थे , लेकिन कभी भी निर्णायक हस्तझेप नही कर पाये , ये वो अपराध है जिसका कोई पश्चाताप नहीं हो सकता ,कोई माफी नहीं हो सकती , फिर भी वो मेरे पिता है , उनसे माफ़ी मांगने के अलावा कोई और रास्ता नहीं हैं , वे हमें माफ़ करें ,हम वो सब उनके साथ नहीं कर पाये जो हमें करना चहिये था ,
उनका निधन ११ सितम्बर 2008 में बिलासपुर में हुआ , हालाँकि उनकी जान ग्वालियर में ही बस्ती थी ,
हमारी माँ
इतने सालो बाद उन्हें याद करते हुए मन भर जाता हैं , वे बहुत सीधी साधी सुन्दर और बहादुर माँ थी ,
उनके ढेरो याद मेरे पास है लेकिन उन्हें विस्तार से अपनी जीवनी में लिखूंगा , माँ को अस्थमा की बीमारी थी ,जो आज मुझे भरी सिद्दत से हैं , उनके रहते उस समय किसी को अस्थमा के बारे में बहुत कुछ मालूम नहीं था ,मेने कभी भी उनका गंभीरता से इलाज़ होता नही देखा , सवेरे शाम वे बेतहाशा हांफा करती थी ,और उनके लिए पास में एस ए एफ के अस्पताल में डॉ दिघे की दवाई लाते थे ,जो शायद अस्थमा की न होक किसी और की होती थी , वे बहुत शांत महिला थी
,उनका और दादा का साथ यंत्रणा का ही साथ कहा जायेगा , [ मेरी सबसे ज्यादा दादा से विरोध या नाराजी अम्मा के साथ उनका बहिष्यना व्यव्हार ही था ] वे हमेशा दादा से बहुत दुखी रही , में कह सकता हूँ की उन्होंने जीवन भर बहुत सहा और इसी दुःख में वो चली भी गई , जब उनकी शादी हुई तब हमारे परिवार की आर्थिक श्थिति बहुत खराब थी , उन्होंने अभाव में अपने घर को सम्हाला , और अपने पांच बच्चों को पाला ,उनके सब बच्चे आज बहुत अच्छी हालत में है ,काश वो देख पाती तो बहुत खुश होती , हालाँकि उनके जीवन में भी थोड़ा बहुत बच्चो को बढ़ते देख लिया था , वे 1982 में बिलसपुर आ गई थी , उन्हें बहुत अच्छा लगता था , वे बहुत ज्यादा बीमार भी नहीं रही , अपने निधन के कुछ महीन ेपहले वे ग्वालीयर चली गई थी , उनका निधन वही हुआ , मेने उन्हें कभी अपनी बहुओ के साथ गंभीर रूप से असहमत नहीं पाया ,
मुझे याद है की वो मुझे बहुत प्यार करती थी ,बहुत कुछ कहना चाहती थी ,बहुत सोचती थी , लेकिन उन दिनों कि भागमभाग और पार्टी का भूत ने मेरे अपनों से भी संपर्क बहुत कम कर दिया था , मुझे इसका भी अफसोस हमेशा रहेगा की उनके निधन के एक दिन पहले में उनकी छोटी बहु यानि अपनी पत्नी को लेने उनके गॉव गया था , में अंतिम दिन उनके पास नहीं था ,दूसरे दिन घर पहुंच पाया ,ऐसे ही हमारी दादी के निधन के समय भी में भोपाल के चक्कर लगा रहा था ,नौकरी के मामले में ,
हमारा पुश्तैनी घर जिसे दादा बेचने को मजबुर हुए , बहुत दर्दनाक लम्हा था ,
मेरे किये वो स्थिति हमेशा बुरे दिनी की तरह आज भी याद हैं , और शायद घर में रोज रोज के क्लेश से मेरे मन में हमेशा के लिए क्लेश के प्रति आशंका ने घर कर लिया , में आज भी सिर्फ और सिर्फ क्लेश से डरता हूँ ,में हर कमर पे अपने घर में शांति और पुरसुकून चाहता हूँ चाहे इसके लिये कोई भी कीमत चुकानी पड़े। हमारे घर में एक तो दादा का व्यवहार और दूसरा पड़ोस में रोज रोज का झगड़ा ,इसने मुझे बहुत प्रभावित किया , खैर इसपे फिर कभी [ अपनी जीवनी में ]
हमारे लश्कर स्थित घर के पड़ोस में एक सज्जन मुँगराम सिंह सिकरवार रहते थे , उन्हें मनीराम दुबे ने अपनी जमीं बेचीं और उसमे हमारे घर के दरवाजे के सामने की जमींन भी बेच दी ,इस प्रकार उनका कहना था की हमारी जमीं पे दरवाजा खोला गया है इसे बंद किया जाये ,इसी बात को लेके रोज रोज झगड़ा होता था , हमारा दरवाजा उनके जमीं खरीदने के पहले खोला गया था , लेकिन ये झगड़ा पुरे घर का सिरदर्द बन गया ,मुक़दमे बाजी के टेंशन अलग , उनका एक लड़का लायक सिंह बहुत बद्तमीज और झगड़ालू था , गाली गलौज , पत्थरबाजी वगैरा रोज की घटना बन गई थी ,सबसे दुखदाई बात ये की हमारे काकाजी की सहानभूति उनके साथ थी , न तो में और न ही हमारे बड़े भाई साहब आदतन झगड़ालू थे , जब घर आओ तब झगड़ा ,मेरी माँ बहुत सीधी साधी थी ,दादा जब नौकरी से आते तो उनके सामने यही क्लेश। मूंगा राम सिंह के साथ हाईकोर्ट से मुकदमा दादा जीत भी गए ,
रोज रोज के टेंशन से परेशान दादा ने शायद हमारी सलाह से उस पुश्तैनी माकन को बेचने का निर्णय लिया , ये निर्णय बहुत अपमानजनक ही कहा गया , हम लोग बेहद आहात थे , शायद पहली बार हम लोग किराये के मकान में जा रहे थे, और बेघर जैसे हो गए थे ,जल्दी जल्दी में सिंधी कॉलोनी में मकान ढूंढा गया ,दो कमरे एक छोटा सा आँगन , यहाँ कुछ माह ही रह पाये ,बाद में गुडीगुड़ा के नके पे बंटा सिंह के मकान में गए , पहली मंजिल पे तीन कमरे छोटा सा आँगन ,इसी मकान में भरत सिंह [ छोटा भाई ] की शादी हुई ,यही मेरे एक पुत्र हुआ और उसका निधन भी यही हुआ ,इसके बाद गोलपाड़िया में एक छोटे से मकान में रहना पड़ा ,जब तक भाई साहब ने रेशम मिल लाइन के पास एक मकान खरीद लिया ,और सब लोग वह शिफ्ट हो गए ,तब तक मेरे नौकरी लग गई थी और दादा ,अम्मा और पप्पू बिलासपुर आ गए थे , इसी रेशम मिल लाइन से डब्बू की शादी हुई।
ये तो ठीक है की हम सबको बहुत बुरा लगा था माकन छोड़ते समय ,लेकिन भविष्य में यही निर्णय बहुत अच्छा साबित हुआ , तीनो भाइयो ने अपने मकान बनवाए और ठीक ठाक संपन्न भी हो गये।भाईसाहब भोपाल में शिफ़्ट हो गए ,
भाई साहब की पहली नौकरी बीएसएफ में
भाई साहब की पहली नौकरी बीएसएफ में लगी , उस समय इनका टर्निंग सेंटर लश्कर के टेकनपुर में था , उस समय बीएसएफ नई नई गठित हुई थी ,भाई साहब नायक के पद पे भर्ती हुए ,ट्रेनिंग के लिए टेकनपुर गए , उस वक़्त ब्रिगेडियर
पाण्डेय थे ,मुझे उनका नाम इसलिए भी याद है क्योकि वे बाद में हमारे साथ मिलिट्री साइंस में एमएससी करने आये थे , हम उनसे कहते थे की जितना हम पढ़ते यही उतना तो आपके तीनो विंग [ नेवी,एयर और लेंड आर्मी ] के लोग भी नहीं जानते ,एक दिन उन्होंने कहा की जतना हमारा
हवलदार फिल्ड में जनता है उतना तो तुम्हारे प्रोफ़ेसर भी नही जानते , सही कह रहे थे , में दो तीन बार टेकनपुर भी गया था , भाईसाहब केसाथ मेस की दाल चावल खाई थी ,
भाई साहब की ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग कश्मीर में हो गई थी ,पता नहीं क्यों बाद मे दादा ने उनकी नौकरी छुड़वा दी , मेने कभी इस विषय पे गंभीरता से भाईसाहब से चर्चा तो नहीं की ,लेकिन में हमेशा सोचता रहा की यदि उन्होंने नौकरी नहीं छोड़ी होती तो वे कमसेकम कर्नल के पद से जरूर रिटायर्ड होते ,और हमारे घर में डिफेन्स का माहोल होता ,नै पीढ़ी सेना में होती , अब इसपर तो भाईसाहब ही कभी कुछ कह सकेंगे ,
खैर वे बीएसएफ की नौकरी छोड़ तो आये ,लेकिन आने के बाद बहुत परेशान हुए ,उन्होंने कहा कहा काम नहीं किया , वे एक वकील के साथ मुंशी बने, मेले म एटेलीफोन अटेंडेंट बने और बाद में हुजरात कोतवाली के सामने एक सहकारी बाजार में लिखा पढ़ी का काम भी किया ,सही में वे बहुत अनिश्चित दिन थे , उसके बाद ही दादा ने उन्हें अपने विभाग में [ वायरलेस ] में ओपरेटर के पद पे नौकरी की ,जहा से वे इन्स्पेक्टर के पद से रिटायर्ड [ भोपाल ] हुए। भोपाल की बहुत सी स्मृतियाँ है जो में अलग से लिखूंगा ,
दादा भाईसाहब को तकनिकी पढाई करवाना चाहते थे ,इसी लिए उन्होंने 8 वी पास करनेके बाद जूनियर टेक्नीकल स्कुल में रेलवे स्टेशन के पास भर्ती करवाया ,इससे उनकी नीव इअतनि पक्की हुई के उनके जीवन भ रकम आई ,और वायरलैस तक काम आई ,
रेशम मिल लाइन में रहने के समय में तो उनके साथ ज्यादा नहीं रह पाया ,लेकिन बबलू या भाईसाहब लिखे तो ज्यादा तथ्यात्मक होगा ,
भाई साहब जब पहली पहली बार भोपाल आये तब वे तलइया थाने के पास एक बहुत छोटे से मकान मे रहते थे
इसके बाद भाईसाहब भोपाल में ही वायरलैस कॉलोनी के सरकारी मकान मे शिफ्ट हो गए , जहा वे 2010 तक रिटायर्ड होने तक रहे , उनके साथ मेने बहुत समय बिताया , जब वो भोपाल रहते थे उस समय में माकपा और बाद में बीजीबीएस में होने के कारण भोपाल रहा , मेरा ट्रांसफर भोपाल हो गया था करीब तीन साल में वह रहा और बाद में जब में बीजीबीएस का राज्य सचिव बना तो भी मुझे वही रहना था , रहने की व्यवस्था जरूर संघठन ने की लेकिन रोज रोज भाईसाहब से मिलना स्वाभविक ही था ,वे थे ही ऐसे की उनके पास जाये बिना मेरा मन मानता ही नह था , पहले भी जब वो नौकरी में आये थे ,तब जब भी घर में सर्विस को लेके लड़ाई होती या गुस्सा होते तब भाईसाहब मुझे लेके भोपाल आ जाते थे , उनका स्वभाव बेहद विनम्र और जिम्मेदारी भरा हैं , उन्होंने पुरे घर मे बड़े होने की सारी जिम्मेदारी निबाही हैं , मेरे ऊपर उनका विशेष वरदहस्त रहा , वो मुझे बहुत प्यार करते है ,मेने आज तक उन्हें अपने ऊपर कभी गुस्सा होते हुए नहीं देखा , लव यू भाईसाहब ,
शिक्षा
ये सही बात है की हम सब भाई बहन की पढाई बहुत ज्यादा नहीं हो पाई एक कारण तो उस समय आर्थिक ही था , भाई साहब जूनियर टेक्नीकल स्कुल में हो पढ़ पाये , भरत और मुन्नी भी ज्यादा नहीं पढ़ पाई , इसमें से सिर्फ मुझे मौका मिल पाया खूब पढ़ने का , स्कुल कॉलेज और बाद में पीएचडी कर पाया , लेकिन बाद की पीढ़ी में सब खूब पढ़े ,उनमे भी डब्बू ज्यादा नहीं पढ़ पाये , बबलू एमबीए [ उज्जैन ] , दिग्विजय पीजी [ भोपाल],सीटू नताशा , एमएसडब्लू , विक्की एमबीए [ बेंगलोर] से प्रीती पीजी और जुली एमएससी , और पता नहीं क्या क्या कर पाई , बस एक अफ़सोस जरूर है मुझे और हमेशा रहेगा की पप्पू मेरे साथ बिलासपुर में रहा ,लेकिन मेरी लापरवाही के कारण ज्यादा नहीं पढ़ पाया , उन दिनों में लगभग घर से कट सा गया था ,दिन रात पार्टी और बीजीबीएस में भागमभाग रही ,लेकिन ये कारण मेरे अपराध को कम नही कर सकते ,
भरत सिंह [ छोटा भाई ]
जैसा की मेने लिखा की भरत को पढ़ने का ज्यादा मौका नहीं मिला , उन्हें दादा ने वायरलैस में ड्रायवर की नौकरी दिलवा दी ,जब भाईसाहब और हमने ग्वालियर छोड़ दिया तो भरत लश्कर में ही रह गए ,आज भी भरत और मुन्नी ग्वालियर मे रहते है , भरत ने शानदार मकान बनवा लिया है ,और अपनी नौकरी थोड़ी बहुत परेशानी केसाथ कर रहे हैं उन्हें भी अपने जीवन में थोड़ी बहुत परेशान रही ,लेकिन उन्होंने किरण के सहयोग से उसपे विजय पाई , वे सब लोगो से बहुत प्यार करते है और उनके मन में सबके लिए बड़ा लाड हैं ,उनकी बेटी सृष्टि और पत्नी किरण बहुत सकून से अपने जीवन जी रहे हैं ,
पप्पू यानी शत्रुघन सिंह
जैसा की हमने पहले भी लिखा था की पप्पू हमारे साथ दादा और अम्मा के साथ 1982 में साथ आ गए थे ,मेने यह कहा भी है की उसकी पढाई ठीक नहीं हो पाई और उसके लिए एक मात्र मे ही जिम्मेदार हूँ ,मुझे इसपे जरूर ध्यान देना चाहिए था। उसका कोई एक्सक्यूज नहीं हो सकता , बाद में जब में भोपाल पंहुचा तो उसकी नौकरी खादी बोर्ड में लगवा दी थी ,जो लगभग 10 साल चली ,लेकिन ये नौकरी कांटेनजेन्सी की थी सो वो खत्म हो गई ,यदि उस समय भी यादो सपोर्ट मेगाते होते तो शायद नौकरी बच भी जाती ,लेकिन नहीं हो पाया ,और इसका उसके जीवन में निर्णायक प्रभाव पड़ा ,भोपाल मेरहते हुए ही तनिष का जन्म हुआ , बाद में अप्पू दुबारा बिलासपुर आ गए , शादी बिलासपुर में ही हो गई ,बहुत कोशिश की कुछ पाये , दुकान भी की लेकिन अनुभव की कमी के कारण वो नही हो पाया ,
पपु की पत्नी ममता ने बड़ी ही जिम्मेदारी से घर सम्हाल लिया , उन्होंने भी बहुत से कामकरने की कोशिश की और वे आजकल अच्छा काम का पाई , तनिश अच्छी पढाई कर रहा हैं ,स्पोर्ट में उसका खास ध्यान है ,आगे चल के उसका कॅरियर स्पोर्ट में बन पायेगा ऐसा हम सोचते हैं ,
नई पौध
आज ये देख के बड़ा सुकून मिलता है की तीसरी पीढ़ी मेसब बच्चे बहुत अच्छी स्थिति में है ,बबलू कोटक महेंद्र में वाइस चेयरमेन है अभी गोवा में है , दिग्विजय [ सीटू ] कार्पोरेट में बढ़िया काम कर रहा है ,आज कल जयपुर में हैं ,डब्बू ने भोपल मेडुलन खोली है ,जो अच्छी चल रही हैं ,विक्की यस बैंक में है जो पुणे में है ,जूली [ ज़हीन ] भी जिला पंचायत में सहायक परियोजना अधकारी है , नताशा के पति कॉलेज में प्रोफ़ेसर है और प्रीति के पति बड़े ठेकेदार है ,मुन्नी की बड़ी बेटी सुमिति चंडीगढ़ में अपने पति के साथ अच्छी तरह रह रही है और छोटी बेटी अमिति स्कुल में पढ़ा रही हैं ,
कुल मिला के आज में कह सकता हूँ की हमारे परिवार की प्रारम्भ हुई यात्रा धीरे धीरे आज ठीक ठाक मंजिल पे पहुंची दिखती हैं।
[ आगे फिर कभी समय मिलेगा तो इसे बढ़ाऊंगा , बहुत सी स्मृतियाँ छोड़ भी दी है जिन्हे में अपनी जीवनी में शामिल करूँगा ]
डॉ लाखन सिंह
21 सितम्बर 2014
बिलासपुर
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